कृष्ण आगमन

श्री गोविन्द देवजी - वृन्दावन से जयपुर की अद्भुत यात्रा 


वह दौर था दमन का, जब आस्था के दीप बुझाने के लिए क्रूर औरंगजेब की तलवार गरज रही थी। आज से हम शुरू कर रहे हैं एक अविस्मरणीय गाथा - 'कृष्ण आगमन'। इस सीरीज में आप पढ़ेंगे.. कैसे दिल्ली के क्रूर बादशाह औरंगजेब की वजह से हजारों साल पुराने दिव्य कृष्ण विग्रह ब्रजभूमि छोड़कर चले गए। कुछ विग्रह 100-200 साल बाद ब्रजभूमि में लौट आए। लेकिन, ज्यादातर श्री विग्रह राजपुताना में बन गए नए धाम के प्राण ...


कहानी से पहले ये जानना जरूरी है...

पहले एपिसोड में आज पढ़िए, वृंदावन के ध्वस्त हुए सात मंजिला भव्य मंदिर के प्रभु गोविंददेव जी की अद्भुत यात्रा, जिसमें उन्हें बैलगाड़ी में घास के भीतर छिपाकर जयपुर पहुंचाया गया था... फिर जयपुर के महलो में विराजे है महाराजाधिराज गोविन्द देवजी...

 ठिकाना मंदिर श्री गोविन्द देवजी, जयपुर 


वृंदावन ...

वृंदावन में यमुना किनारे गोविंददेव मंदिर। संध्या आरती हो रही है। मृदंग, शंख और करताल की धुन के बीच गोविंद का नाम लेकर भक्त झूम रहे हैं। आमेर महाराजा मान सिंह प्रथम द्वारा बनवाया गया यह सात मंजिला मंदिर दीपकों की रोशनी में सोने-सा दमक रहा है। मंदिर के शिखर पर सवा मन यानी 50 किलो घी का विशाल दीप जल रहा है, जिसकी लौ आसमान चीर रही है। इसे कोसों दूर से देखा जा सकता है।

महाराजा मान सिंह द्वारा बनवाया गया 7 मंजिला मंदिर 
(AI द्वारा बनाई गयी फोटो)


मंदिर के सेवायत भावविभोर होकर बोले- "हे गोविंद ! आपका प्रकाश तीनों लोक में फैल रहा है।" मुख्य सेवायत शिवराम गोस्वामी ने आंखें मूंदते हुए धीरे से कहा- "ये लौ घी से नहीं, भक्ति से जलती है। जबतक कृष्णभक्ति है, ये दीप नहीं बुझेगा।"


आगरा का किला...

बादशाह औरंगजेब आगरा के किले में कैद अपने पिता शाहजहां से मिलने आया था। पिता से ठंडी मुलाकात के बाद औरंगजेब किले की छत पर टहल रहा था। तभी दूर आसमान में एक तेज लौ दिखाई दी। उसने चौंककर पूछा- "ये क्या है? रात के अंधेरे में ये कैसी रोशनी है?" जो विशाल ज्वाला के रूप में है..


एक हिंदू सिपहसालार आगे बढ़ा और सिर झुकाकर बोला-"जहांपनाह, ये रोशनी वृंदावन से आ रही है। वहां गोविंददेव जी का मंदिर है। इस मंदिर को आपके दादाजान बादशाह अकबर के समय में आमेर के महाराजा मान सिंह ने भव्य 7 मंजिला महल के रूप में बनाया था। राजा मान सिंह ने मंदिर के शिखर पर एक विशाल दीपक की स्थापना की थी जो सवा मन घी से जलाया जाता है, जब वो दीपक जलता है तो उसकी लौ यहां आगरा से भी दिखाई देती है।"


औरंगजेब की आंखें तमतमा उठीं। दूर रोशनी की तरफ देखकर दांत पीसते हुए बोला- "अच्छा... तो ये वो मंदिर है जो हमारे दादाजान के समय बना था , लेकिन हम अपने दादाजान जैसे नहीं हैं। हम खुदा के बंदे हैं। हमारी हुकूमत में काफिरों का मंदिर इतना बुलंद ? ये गुनाह है...

फिर पलटकर हिंदू सिपहसालार को हुक्म दिया- "जाओ, उस मंदिर को जमीन के बराबर कर दो। हिंदोस्तान की कोई भी मस्जिद इतनी ऊंची नहीं है, तो बुतखाना इतना बुलंद कैसे हो सकता है।" मूर्तियों को तोड़ डालो और उसके टुकड़े मेरे सामने पेश करों...


हिंदू सिपहसालार के चेहरे पर चिंता की लकीरें उभर आईं। वो जानता था कि बादशाह का हुक्म टाला नहीं जा सकता। उसने सिर झुकाकर कहा- "जैसा बादशाह का हुक्म...।" मगर उसके भीतर से आवाज आई, “आस्था का दीप तलवार से नहीं बुझाया जा सकता।"

फौज रवाना करने से पहले हिन्दू सिपहसालार ने अपने एक खास आदमी को बुलाया और धीमी आवाज में आदेश दिया-"तुम्हें मुगल फौज से पहले ये खबर वृंदावन में गोविंददेव मंदिर तक पहुंचानी है। गोस्वामीजी को बता दो कि परसों सुबह होते ही मुगल फौज पहुंचेगी और मंदिर गिरा देगी।"


वृंदावन...

नगर की गलियां उस रात असामान्य रूप से शांत थीं। फिर भी कहीं मृदंग की मद्धम गूंज थी, कहीं कंठों से निकली हरिनाम की झंकार। लेकिन, मंदिर के भीतर अचानक हलचल मच गई थी। हिन्दू सिपहसालार का आदमी मंदिर पहुंचा। उसके चेहरे पर थकान और डर दोनों थे।


वह हांफते हुए बोला- "स्वामी जी, भयानक खबर है। बादशाह ने मंदिर गिराने का फरमान दिया है। परसों सुबह तक फौज यहां पहुंच जाएगी।" मंदिर के मुख्य सेवायत शिवराम गोस्वामी पलभर के लिए जैसे पत्थर हो गए। आसपास खड़े सेवायत हैरान थे। एक ने डरते हुए कहा- "अब क्या होगा महाराज!"


शिवराम बोले- "हम बादशाह से नहीं लड़ सकते। और ना ही इतना समय बचा है की मंदिर की रक्षा हेतु आमेर के महाराजा को सन्देश भिजवा कर आमेर से राजपूत सेना को बुलाया जाये, अब भले ही मंदिर न बच पाए, लेकिन गोविंददेव जी का विग्रह तो बचाया जा सकता है। हमारे पास सिर्फ आज रात का समय है। विग्रह को सुरक्षित स्थान पर ले जाना होगा।"


अब मुश्किल ये थी कि विग्रह नगर से बाहर कैसे निकाला जाए? एक सेवायत बोला- "गोविंद जी को झोली में छिपाकर ले चलें...?" शिवराम ने कहा-"गोविंद जी इतने छोटे नहीं हैं कि झोली में आ जाएं।"


किसी को कुछ सूझ नहीं रहा था। शिवराम गोस्वामी आंख मूंदकर कुछ सोच रहे थे। अचानक उनका ध्यान टूटा और एक सेवायत से बोले- "बैलगाड़ी का इंतजाम करो। उसमें हरा चारा लाद दो। घास के भीतर गोविंद जी को छिपाया जाएगा और हम सब चरवाहे के वेश में चलेंगे... गुज्जर और अहीर चरवाहों की वेशभूषा का इंतजाम करों..

सभी एक-दूसरे की ओर देखने लगे। निराशा में जैसे एक आस जगी हो।


श्री गोविन्ददेव विग्रह का वृंदावन से निकलना...


रात का दूसरा पहर बीत चुका था। पूरा वृंदावन गहरी नींद में था। मंदिर के पीछे से बैलगाड़ी धीरे-धीरे निकली। पीछे हरी घास का चारा, चारे के भीतर गोविंददेव जी का विग्रह विराजमान। शिवराम गोस्वामी गाड़ी के साथ चल रहे थे। उनके पीछे अन्य सेवायत थे। सभी ने गुज्जर-अहिरो की दुधिया-चरवाहा वेशभूषा धारण कर रखी थी.


टोली मुगल चौकी पार कर रही थी। कई सिपाही सोए हुए थे, लेकिन एक जाग रहा था। उसकी तलवार रात के अंधेरे में भी चमक रही थी। सिपाही ने जोर से आवाज दी- "रुको...!"


लेकिन डर को दबाते हुए शिवराम ने गाड़ीवान से कहा-“चलते रहो, पलटकर मत देखना। सब ठाकुरजी पर छोड़ दो।" सिपाही ने भी दोबारा आवाज नहीं दी और बैलगाड़ी रात के अंधेरे में गुम हो गई।


अगली सुबह औरंगजेब की फौज वृंदावन पहुंची। गोविंददेव मंदिर पर तोपें दागी जाने लगीं। मंदिर हिला और सात मंजिला मंदिर का शिखर भरभराकर ढह गया। तीन मंजिलें तोड़ दी गईं। वृंदावन के लोगों की आंखों में आंसू थे और मन में द्वंद्व की हमारे गोविंद जी का क्या होगा ? 

हाथ जोड़े सभी भक्त एक ही प्रार्थना कर रहे थे- “प्रभु कोई लीला करो, हमसे ये देखा नहीं जाता।" उन्हें क्या पता कि प्रभु पहले ही लीला कर चुके हैं। 

उपरी तीन मंजिलो को तोड़ने के बाद जब मुगल सैनिक चौथी मंजिल पर आये तो यकायक एक गर्जना हुई और पूरा मंदिर भूकम्प की तरह थर्रा उठा, इसी गर्जना में कुछ मुगल सैनिक काल का ग्रास बन गये और बची हुई सेना जान बचा के नीचे भागने लगी, ये वही मंजिल थी जंहा वृन्दावन प्रवास के दौरान महाराजा मान सिंह घंटो बैठ कर अपने आराध्य भगवान श्री कृष्ण की भक्ति में लीन रहा करते थे उस मंजिल का नाम था 'मान मंदिर' ... आज भी ये शेष बचा हुआ 3 मंजिला मंदिर वृन्दावन में स्थित है

शिखर और तीन मंजिलो के तोड़ने के बाद सिपाही मंदिर में घुसे।  गर्भगृह का दरवाजा तोड़ा और मशालें जलाईं। देखा तो गोविंददेव जी का विग्रह गायब था।

सिपाही चिल्लाया- "हुजूर, यहां मूर्तियां नहीं हैं। गर्भगृह खाली है। लगता है काफिर मूर्तियां ले गए।" दूसरा सिपाही बोला- "कहां तक बचेंगे? खुदा के बंदों की चाबुक उन्हें ढूंढ निकालेगी।"


राधाकुंड में वास ...

वृंदावन से करीब 25 किलोमीटर दूर, राधाकुंड। शिवराम गोस्वामी ने अपने साथियों से कहा- "वो दूर जंगलों के बीच एक टूटा-फूटा घर दिखाई दे रहा है। गोविंददेव जी वहीं विराजेंगे। यहां आसपास बड़े-बड़े पेड़ हैं, झाड़-झंखाड़ है। सिर्फ ग्वाले ही आते हैं यहां। मुगलों को इस जगह की भनक नहीं लगेगी।"


गोविंददेव कई महीनों तक राधाकुंड के पास विराजमान रहे। जैसे प्रभु गोविन्द तो राधा कुंड में प्रवास के लिए ही वृन्दावन से निकले हो... किसी तरह औरंगजेब को इसकी खबर मिल गई। ये बादशाह के लिए एक हार थी। उसे ये बात चुभ गई। औरंगजेब अपने सूबेदार को फटकारते हुए बोला-


"लानत है तुम पर... काफिर बचकर निकल गए। बुतपरस्ती जारी है। जाओ और देखो वो मूर्ति किसकी है। जहां काफिर पूजा करने जा रहे है... ऊंचे वाले गोविंददेव की हो, तो उसे तोड़ दो। उसके टुकड़े मेरे पास लाओ। जिसने मूर्ति बचाने की गुस्ताखी की, उसका सिर कलम करके मेरे सामने लाओ।"


कामवन, राजस्थान

ये खबर भी किसी तरह सिपाहियों के पहुंचने से पहले गोस्वामी को पता चल गई। आमेर रियासत के मिर्जा राजा जय सिंह के छोटे बेटे कीरत सिंह को खबर भेजी गई। उस वक्त कामवन यानी कामां की जागीर उनके पास थी,   कीरत सिंह ने शिवराम गोस्वामी को कहलवाया कि गोविंददेव जी को लेकर यहां आ जाएं। सभी सेवायत विग्रह को लेकर कामवन पहुंच गए। 



मुगल सिपाहियों को राधाकुंड में कुछ नहीं मिला। औरंगजेब को खबर दी गई, "जहांपनाह, काफिर हमारे पहुंचने से पहले ही जा चुके थे।"


औरंगजेब दांत पीसकर रह गया। उसने अपने विश्वासपात्र जासूसों को आदेश दिया कि किसी भी कीमत पर उस मूर्ति का पता लगाओ। पता लगाने वाले को बड़ा जागीरदार बना दिया जाएगा। हुकूमत की रहमत से मालामाल कर दिया जायेगा. गोविंददेव के विग्रह पर खतरा बढ़ता जा रहा था, लेकिन इस बार सेवायत अकेले नहीं थे। 

कामवन के जागीरदार किरत सिंह कछवाहा भी उनके साथ थे। किरत सिंह ने कई महीनों तक विग्रह की रक्षा की। किरत सिंह गोविन्ददेव की सेवा में रहने लगे,  ये क्षेत्र आमेर रियासत का भाग था जहाँ सीधे तौर पर मुगल सेना आक्रमण करके आमेर से बैर नही लेना चाहते थे..इसलिए अब मुगल सेना यहाँ आने की हिमाकत नहीं कर सकी आमेर महाराजा को जब गोविन्द देव जी के आगमन का समाचार मिला तो उन्होंने गोविन्द देवजी को आमेर पधारने का बुलावा भेजा, आमेर रियासत से समय- समय पर गोविंद जी की सेवा में नजराना भेजा जाने लगा। आमेर से सेना की एक टुकड़ी गोविन्द देवजी की सेवा में भेज दी गयी... मुसीबत के वक्त में भी भगवान को रोज आठ बार भोग लगता था। परम्परा कभी टूटी नही .. और अब भगवान कामवन में प्रवास पर रहे...


कामवन से आमेर...


गोविंद जी अपने सेवायतो के साथ कामवन यानी कामां में रहे। क्योंकि वो कछवाहा राजपूतों द्वारा सुरक्षित जगह थी, 1707 ई. के बाद गोविंद जी ने सांगानेर के पास गोविंदपुरा गांव में अपना पड़ाव डाला। 16 बैलगाड़ियों के साथ गोविंद जी गोविंदपुरा पहुंचे। सबसे आगे गोविंद जी की बैलगाड़ी थी। उनके पीछे सेवायत और फिर आमेर (अब जयपुर) के घुड़सवार सिपाही धर्मध्वजा 'पचरंगा ध्वज' लिए चल रहे थे। ढोल नगाड़ो की गूँज के साथ गोविन्द ढूंढाड़ पधारे.. ढूंढाड़ नरेश स्वयं गोविन्द देवजी की अगवानी करने गये, भव्य स्वागत किया गया..


गोविंदपुरा भी आमेर रियासत का हिस्सा था, लेकिन आमेर महल से वो भी दूर था। महाराजा सवाई जय सिंह (ये मिर्जा राजा जय सिंह के पोते थे) चाहते थे कि गोविंददेव जी उनके नजदीक ही विराजमान हों। करीब 7 साल बाद राजा की इच्छा पूरी हुई। 1714 में गोविंददेव आमेर किले के नजदीक कनक घाटी में विराजमान हुए।


किले तक जाने वाले रास्ते की दाहिनी तरफ मानसागर और पहाड़ियों के बीच मंदिर बना। भक्तों में ऐसा उल्लास था कि मानो रियासत में महीनों से कोई त्योहार चल रहा हो।


महाराजा जय सिंह भी अब निश्चिंत थे। एक दिन गोविंददेव जी ने राजा को सपने में दर्शन दिए।  उन्होंने राजा से कहा- "मुझे इतना दूर मत रख। मुझे तेरे साथ रहना है। मुझे अपने पास लेकर चल। अपने साथ रख।"


राजा हड़बड़ाकर नींद से उठे। उन्होंने उसी समय दीवान विद्याधर भट्टाचार्य को बुलवाया। विद्याधर शिल्पकार भी थे। राजा ने उन्हें महल में कोई ऐसी जगह ढूंढने को कहा, जहां गोविंददेव जी का मंदिर बन सके। ऐसी जगह जो सोते-जागते हमेशा राजा की नजरों के सामने रहे।


राजा ने सपने की बात राजगुरु रत्नाकर पौंडरीक को भी बताई। राजगुरु ने सपने का रहस्य राजा को समझाया-"ईश्वर भक्तों से ऐसे ही बात करता है राजन। ये एक इशारा है। स्वप्न की बात को जल्द से जल्द साकार किया जाना चाहिए।"


विद्याधर भट्टाचार्य ने सुझाव दिया- "महाराज, क्यों न गोविंददेव जी को सूर्य महल में विराजमान किया जाए ? सुबह उठते ही आपको गोविंददेव जी के दर्शन होंगे।"


जय सिंह को सुझाव पसंद आया। गोविंददेव सूर्य महल में विराजमान हुए। महराजा ने जयपुर शहर में मासिक उत्सव का ऐलान किया। राजा ने आदेश दिया- "हाथी-घोड़े सजाकर प्रभु के स्वागत में लगाये जाए। रियासत में कोई भूखा न रहे। आसपास की रियासतों में न्योता भेजा जाए। शंख, मृदंग और करताल से रियासत की गलियां गूंजती रहें।"

आमेर जयपुर में दीवाली-सा माहौल था। आठों पहर भंडारे चलते रहे। बड़े-बड़े व्यापारी, सेठ-साहूकार और आम लोग इस उत्सव में शामिल हुए। गोविंद जी को सैकड़ों तोपों की सलामी दी गई। राजा ने एक और ऐलान किया, ये भक्ति की पराकाष्ठा थी। राजा ने भरे दरबार में धीरे लेकिन साफ शब्दों में कहा- "आज से इस रियासत का राजा मैं नहीं, गोविंददेव जी होंगे। मैं उनका दीवान रहूंगा। दस्तावेजों पर उनका नाम चलेगा। दरबार में मुख्य स्थान उनके लिए खाली रहेगा।"


ये बात आग की तरह फैल गई। "राजा ने राजपाट त्याग दिया, सब गोविंद को सौंप दिया।" लोग बिना पगड़ी-चप्पल पहने महल की ओर दौड़ पड़े। उस भाव ने जैसे जनता को मोह लिया था। राजा ने खुद को पीछे करके भगवान को आगे कर दिया था।


सवाई महाराजा ने गोविंददेव जी को साष्टांग दंडवत किया और बोले- "प्रभु, वृन्दावन में आपका शिखर गिरा दिया गया, पर आपकी आस्था को कोई नहीं गिरा सका। हुकूमतें मिट जाएंगी, तलवारें जंग खा जाएंगी, लेकिन आपकी भक्ति हमेशा रहेगी। आप हमेशा रहेंगे।"


जयपुर के सिटी पैलेस में गोविंददेव मंदिर आज भी उस दिन का गवाह है, जब तोप-तलवारें हारीं और आस्था-विश्वास जीते।


अब पढ़िए वृंदावन में कैसे बना था गोविंददेव मंदिर


5000 वर्ष पहले भगवान श्री कृष्ण के परपोते वज्रनाभ ने अपनी दादी के बताये अनुसार अपने परदादा श्री कृष्ण के 3 दिव्य विग्रह बनाये थे जिनमे प्रथम गोविन्द देवजी जिनका मुख मंडल हुबहू कृष्ण जैसा है द्वितीय श्री गोपीनाथजी जिनका वक्षस्थल एवं भुजाये हुबहू कृष्ण जैसी है और तीसरे मदन मोहनजी जिनके चरण हुबहू कृष्ण जेसे है। तभी से ये विग्रह सनातन में पूजित है
कालान्तर में महमूद गजनवी के आक्रमण के समय 1025 ई. के लगभग ये तीनों विग्रह अलग-अलग स्थान पर छुपा दिए गये थे। ये समय तुर्कों के आक्रमणों का रहा और 500 वर्षो तक तुर्कों के आक्रमण होते रहे। 
इसके 500 वर्ष बाद धर्मरक्षक महाराजा मान सिंह आमेर ने बर्मा, बंगाल से लेकर ईरान तक तुर्कों का संहार करने के बाद धर्म की स्थापना के क्रम में अपने आराध्य भगवान श्री कृष्ण की कृपा एवं प्रेरणा से एवं चैतन्य महाप्रभु के शिष्य गोस्वामी के सहयोग से वसंत पंचमी 1525 ई. के दिन वृन्दावन के गोमा टीला से समाधिस्थ इन श्री विग्रह को ससम्मान निकाला ये एक ऐतिहासिक दिवस बन गया। आमेर के महाराजा मान सिंह ने तीनों विग्रहो के लिए वृन्दावन में भव्य मंदिरों का निर्माण करवा के विग्रहो की विधिवत स्थापना अपने कर कमलो से करवायी, साथ ही वृन्दावन को फिर से पुराना वैभव एवं सम्मान प्रदान किया। 
औरंगजेब के वृन्दावन पर किये आक्रमणों के समय अधिकतर सभी मंदिरों के पुजारी इन दिव्य विग्रहो को बचाकर जयपुर रियासत में ले आये क्योंकि जयपुर के धर्मरक्षक शासक ही उस विपरीत काल में इन दिव्य विग्रहो की रक्षा का साहस रखते थे और जयपुर के राजा मान सिंह द्वारा ही ये विग्रह वृन्दावन में स्थापित किये गये थे जो अपने प्रिय भक्त के राज्य से स्वयं गोविन्द भी दूर नही रहना चाहते थे इसलिए वे भी स्वयं जयपुर ही चले आये और जयपुर बन गया दूसरा वृन्दावन... गुप्त वृन्दावन। 








स्टोरी एडिट- कुँ. प्रवीण सिंह नाथावत 




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मथुरा-वृंदावन के वृहद हिंदू मंदिरः डॉ चंचल गोस्वामी। ब्रज विभावः संपादक गोपाल प्रसाद व्यास। द कंट्रीब्यूशन ऑफ मेजर हिंदू टेंपल्स ऑफ मथुरा एंड वृंदावनः डॉ चंचल गोस्वामी। औरंगजेबनामाः संपादक डॉ अशोक कुमार सिंह। ब्रज के धर्म संप्रदायों का इतिहासः प्रभुदयाल मीतल। सनातन के संरक्षण में कछवाहों का योगदानः डॉ सुभाष शर्मा-जितेंद्र शेखावत। गोविंद गाथाः नंदकिशोर पारिख। लक्ष्मी नारायण तिवारी, सचिव- ब्रज संस्कृति शोध संस्थान, वृंदावन। जयपुर इतिहास के जानकार- जितेंद्र शेखावत, संतोष शर्मा, सिया शरण लश्करी, प्रो देवेंद्र भगत (राजस्थान यूनिवर्सिटी), दैनिक भास्कर 



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'रण कर-कर रज-रज रंगे, रज-रज डंके रवि हुंद, तोय रज जेटली धर न दिये रज-रज वे रजपूत " अर्थात "रण कर-कर के जिन्होंने धरती को रक्त से रंग दिया और रण में राजपूत योद्धाओं और उनके घोड़ो के पैरों द्वारा उड़ी धूल ने रवि (सूरज) को भी ढक दिया और रण में जिसने धरती का एक रज (हिस्सा) भी दुश्मन के पास न जाने दिया वही है रजपूत।"